388 साल पुराना हर्षोलाव बना शराबियों का अड्डा, जुआरियों की यज्ञशाला

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– हर्षोलाव से बह गया नूर

अनुराग हर्ष.बीकानेर

पहले
वर्ष 1980 की बात है, हर्षोलाव तालाब के चारों तरफ सैकड़ों की संख्या में लोग खड़े रहते थे। तालाब की तरफ नजर गाड़े यही देखते कि कौन तैराक आगे चल रहा है। अपने साथी का हौंसला बढ़ाने के लिए इतना हल्ला करते कि दूर तक सुनाई देता। तैराक भी जोश में आता और आगे निकलने का भरसक प्रयास करता। जिस दिन तैराकी प्रतियोगिता होती थी, उस दिन तालाब को चारों तरफ से सजाया जाता, फर्रियां लगाई जाती। विजेताओं को पुरस्कार दिया जाता, रात को भोजन भी यहीं होता।
अब
आज तालाब के चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है। कभी किसी पक्षी की आवाज सन्नाटे को चीरती है तो कभी पानी में फुदकते मेंढक की टर्रटर्र सुनाई देती है। तालाब के बीच में कुमोदिनी (काई से पहले की स्थिति) फैली हुई है। जहां तक नजर जाती है, वहां तक साफ पानी नहीं दिखता। चारों तरफ कींकर के पेड़ दिखते हैं और तालाब के ठीक आसपास चौकियों पर शराब, बीयर, अधे और पव्वे बिखरे नजर आते हैं। तालाब के पानी में प्लास्टिक की बोतलें और गंदगी तैरती दिखती है तो मंदिर में बैठे शिव भी शर्मसार नजर आते हैं।

इतिहास
बीकानेर का संभवत: यह सबसे पुराना तालाब है। मंदिर में लगे शिलालेख के मुताबिक इस तालाब की नींव आसोज सुदी पूर्णिमा संवत 1688 अर्थात 9 अक्टूबर 1631 को इसका निर्माण हुआ था। अमरेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट के नन्दलाल हर्ष की माने तो तालाब 388 वर्ष पुराना है। बारह साल बाद यह तालाब चार सौ साल का हो जाएगा। अमरेश्वर महादेव मंदिर के पास स्थित इस तालाब का धार्मिक व पारम्परिक महत्व है। कालांतर में मंदिर के श्रद्धालुओं की संख्या में तो वृद्धि हो रही है लेकिन तालाब में तैराक अब नजर नहीं आते।

वर्तमान दशा का बड़ा कारण

तालाब के चारों तरफ आगोर को बजरी के चक्कर में लोग नोच नोचकर खा गए। तालाब की आगोर में इतने गड्ढे कर दिए गए हैं कि अब पानी किसी भी तरफ से नहीं आ रहा। तालाब के ठीक ऊपर जो क्षेत्र है, वहीं से बहता हुआ पानी आता है, जो कुछ पेडियों तक भर जाता है। इस बार वैसे भी वर्षा कम हुई लेकिन जितनी हुई, उसके मुताबिक पानी तालाब में नहीं आया। जो आया वो भी इतना गंदा है कि कोई भी सामान्य आदमी इसमें पांव रखने में संकोच कर रहा है। हालांकि ट्रस्ट से जुडे नन्द लाल हर्ष कहते हैं कि पानी गंदा नहीं है, थोड़ा बहुत हाथ हिलाने से साफ पानी नजर आने लगता है।

अतिक्रमण और गंदे पानी की नालियां
तालाब के चारों तरफ लोगों ने अतिक्रमण कर लिए हैं। यहां तक कि आगोर की भूमि पर भी लोगों ने घर बना लिए हैं। इस अतिक्रमित जमीन पर बने मकानों व सामने बने मकानों का पानी सीधे तालाब की आगोर में छोड़ दिया जाता है जो घर की गंदगी को रोज तालाब तक पहुंचाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक पचास से अधिक मकानों का गंदा पानी रोज इस तालाब में डाला जाता है। इतना ही नहीं आवारा व पालतू पशु भी इसी क्षेत्र में छोड़े जाते हैं जो तालाब के आसपास गंदगी करते हैं। आसपास जो लोग पशुपालन करते हैं, वो भी गायों व भैंस का कचरा इसी आगोर में फैंकते हैं जो पानी के साथ बहकर तालाब के चारों तरफ फैल जाता है।

शराबियों का अड्डा, जुआरियों की यज्ञशाला

तालाब का महत्व यहां के मंदिर के कारण है, लेकिन भारी मात्रा में शराब के शौकिन दिन ढलते ही यहां पहुंच जाते हैं। तालाब के आसपास विचरण करने पर शराब की बोतलें नजर आती है। इतना ही नहीं तालाब परिसर में बनी यज्ञशाला में बड़ी संख्या में लोग रोज जुआ खेलते हैं, ताश पत्ती खेलते हैं। कई बार पुलिस यहां से जुआरियों को पकड़ चुकी है लेकिन स्थायी रूप से कोई काम नहीं हो रहा। यज्ञशाला के गेट तक लोग उतार कर ले गए।

कैसे होगा तर्पण?

तालाब में ऋषिपंचमी के दिन बड़ी संख्या में लोग तर्पण करते हैं। विद्वान नथमलजी पुरोहित के साथ पहुंचने वाले लोगों को ही तालाब की साफ सफाई करनी पड़ती है। तालाब की गंदगी देखकर बड़ी संख्या में लोग अब आसपास के दूसरे तालाबों में जाने लगे हैं। ऐसे में इस बार भी ऋषि पंचमी से पहले तालाब साफ नहीं हुआ तो तर्पण करने वालों को विकल्प देखना पड़ेगा।

गोठ तो होती है लेकिन तालाब वाली नहीं

मंदिर के पास ही बने हॉल के कारण यहां गोठ का दौर तो चलता है लेकिन तालाब के कारण यह गोठ नहीं होती। अब वो रौनक नहीं रही जो आज से दस-पंद्रह साल पहले तक होती थी। हालात यह है कि सावन के पूरे महीने में कोई तालाब में तैरने नहीं आया।

इनका कहना है…
‘तालाब का जीर्णोद्धार करने के लिए जिला प्रशासन, नगर निगम व नगर विकास न्यास को कई बार पत्र दिए हैं लेकिन किसी का ध्यान नहीं है। हाल ही में नगर निगम की एक योजना के तहत मंदिर का विकास होना था लेकिन तत्कालीन सरकार ने यह कहते हुए बजट नहीं दिया कि यह ग्रामीण क्षेत्र में नहीं आता।’
-नन्दलाल हर्ष, ट्रस्टी श्री अमरेश्वर महादेव मंदिर ट्रस्ट