ये है असल एक देश-एक पुस्तक वाला निर्णय

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अनुराग हर्ष.

प्रदेश की अशोक गहलोत सरकार ने कक्षा नौ से बारह तक के विद्यार्थियों के लिए एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्) की पुस्तकें ही पढ़ाने का निर्णय किया है। यह सामान्य रूप से पाठ्यपुस्तकें बदलने वाला निर्णय नहीं है बल्कि एक ऐतिहासिक व क्रांतिकारी निर्णय है। आने वाले वर्षों में इस निर्णय के सकारात्मक परिणाम नजर आएंगे। वर्तमान में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अजमेर (आरबीएसई) और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) में अलग-अलग पुस्तकें पढ़ाई जाती है। जो विद्यार्थी आरबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उन्हें मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए होने वाली नीट व आईआईटी में प्रवेश के लिए होने वाली जेईई की तैयारी के दौरान एनसीईआरटी की किताबें फिर से पढऩी पड़ती है। वहीं सीबीएसई स्कूल में पढऩे वाले विद्यार्थियों को ऐसी किताबें कक्षा नौ से ही पढऩे को मिल जाती है। राज्य सरकार के नए निर्णय के बाद यह अंतर खत्म हो जाएगा। यह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि राज्य सरकार ने सीबीएसई व आरबीएसई स्कूलों का अंतर खत्म कर दिया है। कम से कम पढ़ाई के मामले में अब आरबीएसई स्कूल का स्तर पर भी सीबीएसई से कम नहीं होगा। अभिभावकों की दृष्टि से देखें तो उन्हें अंग्रेजी माध्यम के आरबीएसई स्कूल में भी सीबीएसई की पढ़ाई मिल सकेगी, जो सीबीएसई की तुलना में काफी किफायती साबित हो रही है। एक अनुमान के मुताबिक सीबीएसई स्कूलों की फीस आरबीएसई स्कूलों की तुलना में दो से तीन गुना अधिक है। इसका कारण वहां के खेल मैदान, वातानुकूलित कक्षा कक्ष सहित अन्य सुविधाएं हैं। जिसे जायज भी माना जा सकता है। वहीं अंग्रेजी माध्यम की आरबीएसई स्कूल भी अब पढ़ाई के मामले में कम नहीं होगी। जब दोनों स्कूलों में एक ही तरह की किताबें पढ़ाई जा रही है तो किफायती विद्यालय ढूंढने का विकल्प भी अभिभावक को मिलेगा।
देश में अभिभावकों की सबसे बड़ी शिकायत कक्षा नर्सरी से आठवीं तक की महंगी पुस्तकों से है। हाल ही में एक व्हाट्सएप संदेश मिला कि नर्सरी कक्षा की पुस्तकें चार हजार रुपए की है जबकि एमबीबीएस प्रथम वर्ष की पुस्तकें इससे भी सस्ती है। सरकार को चाहिए कि वो देशभर में कम से कम अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें एनसीईआरटी की ही लागू कर दें। इससे अभिभावक की जेब पर पडऩे वाला अतिरिक्त भार कम होगा। किताब चाहे कोई भी प्रकाशित करे लेकिन अक्षरश: सभी एक जैसी होनी चाहिए। उसके कागज की क्वालिटी अलग हो, चित्र अलग हो, प्रश्र अलग हो, अभ्यास अलग हो लेकिन अध्याय अक्षरश: एक होने चाहिए। ऐसे में अभिभावक चाहे तो एनसीईआरटी की पुस्तक खरीदे और चाहे तो किसी निजी प्रकाशक की। ऐसा करने से हर आम और खास व्यक्ति अपने बच्चों को एक जैसी शिक्षा दिला सकेगा। इस देश में पढ़ाई के नाम पर अमीर और गरीब के बीच अंतर इसी तरह खत्म होगा। किताबों के नाम पर कमीशनखोरी पर भी अंकुश लग जाएगा।