…तब बीकानेर के जोशी ने सिर्फ 150 रुपये में लड़ लिया चुनाव

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डीएनआर रिपोर्टर. बीकानेर

चुनावों की चर्चा हर चौक, पाटे पर हो रही है। जगह जगह लोग चुनाव के बारे में बातें कर रहे हैं, ऐसे में पुराने जमाने की बातें भी सामने आ रही है। ऐसे में आज के समय बदले चुनावों की तस्वीर को देखकर बुजुर्गों भी अपने अनुभव नई पीढ़ी से साझा करती हुई नजर आती है। हालांकि कमोबेश सभी युवाओं का एक सवाल कि आपके समय में कैसे चुनाव होते थे, तब और अब में क्या बदलाव आया है। पुराने समय के होते चुनाव को लेकर नगर परिषद के पूर्व पार्षद जुगल किशोर जोशी उर्फ जीसा अपने चुनाव को याद करते हुए कहते हैं कि उस समय चुनाव पार्टी आधारित नहीं होते थे साथ ही आज की तरह चुनावों में ज्यादा खर्चा भी नहीं होता था। जीसा जोशी ने बताया कि उन्होंने 60 साल पहले १९५९ में महज 250 रूपये में पूरा चुनाव लड़ लिया। जोशी के अनुसार उस चुनाव में वे राजस्थान में हो रहे उस समय के नगर पालिका चुनावों में सबसे युवा उम्मीदवार थे। जोशी ने बताया कि वर्तमान राजनीति और उस समय की राजनीति में काफी फर्क आ गया है। उस समय चौक, मोहल्ले और समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति जिसके साथ हो जाते थे पूरा समाज और मोहल्ला उनकी बात मानकर वोट दे देता था लेकिन अब मतदाताओं की सोच में परिवर्तन आया है और उसकी खुद की पसंद और नापसंद वो बताने लग गया है। अब मतदाता अपनी सोच से वोट देता है। जोशी के अनुसार उस समय जातिवाद इतना हावी नहीं था जितना आज नजर आता है, मतदाता के घर जाकर और व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर चुनाव लड़ा जाता था, घर परिवार और मोहल्ले के लोग ही पूरा चुनाव संभाल लेते थे। बड़े नेताओं का ज्यादा हस्तक्षेप नहीं था और बड़े नेता सभी उम्मीदवारों को चुनाव लडऩे की छूट दे देते थे। अपने चुनाव को याद करते हुए कहते उन्होंने कहा कि उन्होंने उस समय के कद्दावर नेता मुरलीधर व्यास के चहेते और समाजवादी नेता एडवोकेट हनुमान आचार्य को हराया था। जोशी बताते हैं कि उस चुनाव में उनके खुद के रिश्तेदार जयहजारा दल भी उनके सामने उम्मीदवार थे लेकिन व्यक्तिगत वैमनस्यता या कटुता हावी नहीं थी और शायद उस समय के लोग कुछ मामलों में ज्यादा लोकतांत्रिक थे। इसी तरह उस समय के चुनावों में उम्मीवार रहे कन्हैयालाल उर्फ घेटड़ महाराज अपने चुनाव को याद करते हुए बताते हैं कि उनका चुनाव निशान तराजू था और उन्होंने तीन जगह, नत्थूसर गेट पर, बारह गुवाड में और संसोलाव तालाब पर बडे तराजू बनाकर लगाए थे। घेटड़ महाराज के अनुसार उन्होंने महज 150 रूपये में पूरा चुनाव लड़ा और सिर्फ चाय बनाकर समर्थकों को पिलाते थे। घेटड़ महाराज ने बताया कि उस समय के नेता अपने प्रतिद्वंद्वी को चुनाव मैदान से हटाने की नहीं सोचते थे, उनके अनुसार उनके सामने तत्कालीन उम्मीदवार मगनलाल आचार्य स्वयं उनके घर आए और कहा कि तुम चुनाव लड़ो किसी के कहने में आना मत और चुनाव से बाहर मत होना।
घेटड़ महाराज ने बताया कि उस चुनाव में उनके सामने पर्चा भरने वाले सभी उम्मीदवार मैदान में रहे। घेटड़ महाराज बताते हैं कि उस दौर में धनबल या बाहुबल का कोई स्थान नहीं था और न ही धनबल से वोट खरीदे जाते थे।
घेटड़ महाराज वर्तमान राजनीति से खफा हंै ंउनके अनुसार अब चुनाव इतने व्यक्तिगत हो गए हैं कि अगर आप राजनीति में किसी का विरोध करो तो वो आपसे व्यक्तिगत संबंध समाप्त कर लेता है। वे कहते हैं कि ये स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा की सोच नहीं है। हालांकि आज का दौर बदला है तो पुरानी राजनीति की कुछ चीजें बदली है लेकिन यह सही है कि पुराने दौर की कुछ स्वस्थ परंपराएं अब भी राजनीति में कायम रहे तो लोकतंत्र के इस पर्व की महत्ता बनी रहेगी।