पार्टियों की मार्केटिंग में, ग्राहक जैसा हो गया वोटर

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अनुराग हर्ष.
‘लोकसभा चुनाव का शोर थम गया है।’ वैसे शोर ज्यादा था भी नहीं। चुनाव आयोग की सख्ती कहो या फिर सख्ती के बहाने नेताओं की ओर से धन बचाने की कवायद मान लो। शोर कम हो गया। कारण कोई भी रहा हो, लोकसभा चुनाव में विधानसभा चुनाव जितना हल्ला अब नहीं होता। न सिर्फ बीकानेर या नागौर शहर बल्कि अधिकांश गांवों तक भी नेता नहीं पहुंचे हैं। खुद प्रत्याशी सुबह से रात तक घूम तो रहे हैं लेकिन कितने क्षेत्र तक पहुंचे हैं, इसका अनुमान उनको भी नहीं। अगर आंकड़ा निकाला जाए तो शायद पांच-दस फीसदी भी नहीं। वैसे यह सोच गलत है कि प्रत्याशी मेरे से आकर वोट मांगेगा तभी उसे वोट दूंगा। राजनीतिक पार्टियां अपनी नीति और रीति के आधार पर अपने चुनाव घोषणा पत्र के नाम पर आपसे वोट मांगती है। उन्हीं को ध्यान में रखकर वोट देना चाहिए। विधानसभा चुनाव में हम व्यक्तिगत हो जाते हैं क्योंकि वहां प्रत्याशी से सीधे संपर्क होता है। उम्मीदवार के साथ कई तरह के राग और द्वेष होते हैं, ऐसे में किसी का समर्थन और किसी का विरोध करने के लिए जनता सड़कों पर आ जाती है। लोकसभा चुनाव में ऐसा नहीं होता। शहरी क्षेत्र में कुछ बड़ी सभाओं को छोड़ दें तो नुक्कड़ सभाओं का फैशन ही खत्म हो गया। शहर के किसी भी कोने में कोई नुक्कड़ सभा याद नहीं हुई। खैर…। सभाओं को वैसे भी आजकल कोई सुनता नहीं है। बीकानेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा में भी सुनने वाले कम थे और देखने वाले ज्यादा थे। खुद मोदी को कहना पड़ा कि आप शांत हो जाए। जब चुप होंगे तभी बोलूंगा। दरअसल, इस तरह के हालात तब बनते हैं जब सामने कोई गंभीरता नहीं रखे। न सिर्फ मोदी अगर राहुल गांधी आते तो वहां भी सुनने वाले कम होते, राहुल को देखने वाले ज्यादा होते। विचारों की लड़ाई दरअसल, हम बहुत पीछे छोड़ आए हैं। राष्ट्रीय पार्टियों ने जिस तरह की मार्केटिंग शुरू की, उसी में हम बहते चले गए। किसी ने राष्ट्रवाद का नाम लेकर देशभर में अभियान चलाया तो किसी ने प्रधानमंत्री की छवि को खराब करने के लिए दिन-रात एक कर दिए। सब कुछ ‘मार्केटिंगÓ की तरह है। ठीक वैसे ही जैसे एक कंपनी आपको ‘रेफ्रीजरेटरÓ या ‘बाइकÓ खरीदने के लिए इतने विज्ञापन दिखाती है कि आप जब भी ये उत्पाद लेने जाते हैं तो यही दो कंपनियां आपको याद रहती है। ठीक वैसे ही कांग्रेस और भाजपा ने चुनावी कैंपेन को चलाया है। आंख बंद करके हम पार्टियों के बहकावे में आ जाते हैं और असल मुद्दों से किनारे हो जाते हैं। ऐसे मतदाताओं की संख्या नगण्य है जो मुद्दों पर आधारित मतदान करते हैं। सांसद ने पिछले पांच वर्ष में शहर के लिए क्या किया, क्या करना चाहिए था? काम का आंकलन करना हमने बंद कर दिया है। व्यक्तिगत इस हद तक हो गए हैं कि किसी को पटखनी देने के लिए, किसी को सबक सिखाने के लिए, किसी की हैसियत कमजोर करने के लिए, किसी से लाभ लेने के लिए, किसी से पद लेने के लिए, किसी को नीचा दिखाने के लिए हम पार्टियों और प्रत्याशियों का समर्थन कर रहे हैं। देश शायद बहुत पीछे चला गया है। व्यक्तिगत लाभ और हानि को ध्यान में रखकर ही मतदान किया जा रहा है। जो लोग राष्ट्रवाद के प्रमाण पत्र बांट रहे हैं, उनके कामकाज का भी आकलन करना चाहिए। उन्होंने पांच साल में अपनी पार्टी के हित को ध्यान में रखते हुए कितने काम किए और देश को हित में रखते हुए कितने काम किए। जो देश के प्रधानमंत्री पर परोक्ष रूप से ‘चोरÓ होने का गंभीर आरोप लगा रहे हैं, वो अपने राज काल में हुए घोटालों की जांच की बात क्यों नहीं करते? यह मानना पड़ेगा कि सभी पार्टियां सिर्फ सत्ता तक पहुंचना चाहती है, जनता इसका माध्यम है, इसलिए उसे किसी न किसी तरह की मार्केटिंग से बहला-फुसला लिया जाता है। मतदाता को जागरुक होना पड़ेगा, अन्यथा लोकतंत्र अर्थहीन है।