सेवा का तीर्थ बना अपनाघर

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जयनारायण बिस्सा.बीकानेर
अकसर लोग पुण्य कमाने के लिए चारों धाम की यात्रा पर जाते हैं, जिसमें लाखों रुपए भी खर्च होते हैं, लेकिन सेवा सबसे बड़ा पुण्य है। जिसने जरूरतमंद की सेवा, सहायता करने के जज्बे को आत्मसात कर लिया, उसे चारों धाम की यात्रा करने की भी जरूरत नहीं पड़ती है। कुछ इसी राह पर चल रही है शहर की कुछ संस्थाएं। इनमें से एक है अपनाघर। मां माधुरी बृज वारिस सेवा सदन द्वारा संचालित अपना घर आश्रम मानव सेवा का पर्याय बन गया है। यह केवल बीकानेर में ही नहीं देश के हर कोने में स्थापित है। जहां मानव हित में अनेकों कार्य किए जाते रहे हैं। आश्रम के समर्पित कार्यकर्ता सेवा कार्य को अंजाम दे रहे हैं। अपना घर के देश भर में 17 आश्रम हैं, जहां निराश्रितों को रखा जाता है। इनमें ज्यादातर मानसिक रूप से विक्षिप्त लोग हैं। मंदबुद्वि एवं मनोरोगियों को पुन:सजाने संवारने और स्थापित करने के उद्देश्य से 26 मई 2013 में स्थापित अपनाघर आश्रम पिछले छ: वर्ष में अपनों के वंचितों को जो अपनत्व दिया। उससे यहां प्रवास कर रहे प्रभु आवासियों को नवजीवन मिला। यहां रह रहे आवासियों में न सिर्फ दानदाताओं ने बल्कि पीबीएम अस्पताल के चिकित्सकों,जिला प्रशासन ने सकारात्मक सहयोग दे रहे है। समय समय पर यहां प्रभु आवासियों की चिकित्सकीय जांच के साथ साथ धार्मिक व रचनात्मक आयोजन भी होते आए है।
अब तक 1432 को प्रवेश
स्थानाभाव के चलते भरतपुर मुख्यालय स्थानान्तरित 661
ठीक होकर अपने घर गए 454
पंचतत्व में विलिन हुए 224

ये सुविधाएं है उपलब्ध
रानीबाजार स्थित सेवा आश्रम में यहां रह रहे आवासियों के लिये सुव्यवस्थित कमरें है। साथ ही मनोरंजन के साधन के साथ साथ सैलून,एयर बैड्स,एम्बूलेंस,व्हील चेयर्स,डी फ्रीज,शीतल जल मशीन व प्राथमिक उपचार केन्द्र की व्यवस्था भी है।
इनका कहना है…
समाज सेवा हमारे लिए कोई नई अवधारणा नहीं है। यह मानव मन की वह मौलिक भावना है, जो हमें मुश्किल घड़ी में अपने साथियों, गरीब, जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए तत्पर करती है। अपनाघर जैसी समाजसेवी संस्था समाज सेवा की भावना की इसी नींव पर खड़ी हैं। नर सेवा नारायण सेवा के उद्देश्य से अपनाघर आश्रम काम कर रहा है। हमारा प्रयास रहेगा कि हम पूरी निष्ठा से इस जिम्मेदारी को निभा सकें।
-डी पी पच्चीसिया,अध्यक्ष अपनाघर

‘अपना घर बीकानेर की धरोहर है,इसके संचालन की सम्पूर्ण जिम्मेदारी समाज की है। उन्हीं के सहयोग से आज तक इसका सफल संचालन हो पाया है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जिन लोगों ने इसके संचालन में सहयोग किया है वो साधूवाद के पात्र है।
-अशोक मून्दड़ा, सचिव