बीकानेर – इस कारण गंगा बाल विद्यालय नहीं हो सकता अंग्रेजी माध्यम

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बीकानेर। शिक्षा विभाग ने बीकानेर पश्चिम में स्थित मुरलीधर व्यास कॉलोनी के स्कूल को अंग्रेजी माध्यम में तब्दील तो कर दिया, लेकिन इसकी असल हकदार गंगा बाल विद्यालय था। दरअसल, एक तकनीकी कारण के चलते गंगा बाल विद्यालय को अंग्रेजी माध्यम का दर्जा नहीं मिल सका। जबकि हकीकत में वर्षों तक यह विद्यालय अंग्रेजी माध्यम में ही संचालित होता था।
गंगा बाल विद्यालय का परिचय
महाराजा करणी सिंह स्टेडियम के पीछे और साइकिल वेलोड्रम के सामने स्थित गंगा बाल विद्यालय की स्थापना आजादी से पहले हुई थी। तब यह स्कूल सार्दुल स्पोट्र्स स्कूल (तत्कालीन सार्दुल पब्लिक स्कूल) का हिस्सा था। तब इस स्कूल में हिन्दी व अंग्रेजी दोनों माध्यम थे। जब शहर में इक्का दुक्का अंग्रेजी माध्यम के स्कूल थे तब मध्यम वर्ग के लिए गंगा बाल विद्यालय में प्रवेश मिलना भी गौरव का विषय था।
यह रहा कारण
इस बार गंगा बाल विद्यालय को अंग्रेजी माध्यम में तब्दील नहीं करने का प्रमुख कारण यह था कि इसका नाम पहले से महाराजा गंगा सिंह के नाम से था। दो नाम एक साथ हो नहीं सकते थे और महाराजा गंगा सिंह का नाम हटाने से विवाद संभव था। दूसरा बड़ा कारण यह भी रहा कि यह पहले से विशिष्ट विद्यालय की श्रेणी में है (हालांकि अब विशिष्ट जैसा कुछ रहा नहीं है।)।
खुद की बस थी
इस विद्यालय के पास खुद की स्कूल बस थी, जिससे दो ट्रिप करके बच्चों को शहर के हर हिस्से से लाया जाता था। अब हालात यह हो गए हैं कि नई बस है नहीं,पुरानी कबाड़ के भाव चली गई। किसी भामाशाह के माध्यम से भी अगर नई बस मिल जाए तो इस स्कूल का स्तर फिर से सुधर सकता है।
तबादला है बड़ी समस्या
आमतौर पर गंगा बाल विद्यालय में काम करने वाले शिक्षकों का तबादला नहीं होता था, ऐसे में इन शिक्षकों ने बेहतर शिक्षण कार्य करवाया। अब विद्यालय में कैसा भी पढ़ाओ, तबादला हो सकता है। पिछले दिनों शारीरिक शिक्षक सुबोध मिश्रा का तबादला कर दिया गया, जिन्होंने अपने खेल में राष्ट्रीय स्तर का प्रदर्शन गरीब बच्चों से भी करवाया। मिश्रा का तबादला होते ही कई बच्चों ने स्कूल छोड़ दी। मिश्रा आज भी गंगा बाल विद्यालय के सामने बच्चों को प्रशिक्षण दे रहे हैं लेकिन विभाग उनका तबादला यहां नहीं कर रहा।
यह शिक्षक आते हैं याद
इस स्कूल में 1970, 1980 व 1990 के दशक में पढ़ाने वाले शिक्षकों को आज भी याद किया जाता है। इंद्रा हर्ष के प्राचार्य काल की सबको याद आती है। इतना ही नहीं शारदा भटनागर व अमरचंद पुरोहित जैसे शिक्षकों का अभाव खलता है। ऊषा पालीवाल, संतोष गोस्वामी, कमलेश वर्मा, सरदार सर जैसे शिक्षकों का समर्पण अब नजर नहीं आता। यह कुछ नाम है जो याद है, लेकिन इस कार्यकाल के हर शिक्षक ने शानदार काम किया।