आधी आबादी का हक आज भी अधूरा

डीएनआर रिपोर्टर. बीकानेर
घर हो या कार्यक्षेत्र, भारत में लैंगिक असमानता की जड़ें बहुत गहरी हैं। पर चुनाव एक ऐसा क्षेत्र है जहां महिलाओं ने अपनी मौजूदगी का न सिर्फ अहसास कराया है बल्कि बदलाव लाने में एक बड़ी भूमिका भी निभाई है। इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह बदलाव सरकार में बैठे लोगों की बनाई नीतियों का नतीजा न होकर महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए उनके द्वारा उठाया स्वैच्छिक क दम है। हालांकि यह क्रांति सही मायनों में उनकी राजनीतिक हैसियत को बढ़ाने में कोई भूमिका नहीं निभा सकी है। बात करं बीकानेर लोकसभा सीट में वर्ष 1952 से 2014 तक 16 बार चुनाव हुए हैं। इस बार 17वीं बार चुनाव हो रहे हैं। भले ही महिला सम्मान एवं उत्थान की प्रमुख दलों द्वारा बात की जाती रही हो, लेकिन 67 साल के लोकसभा चुनाव के इतिहास में बीजेपी और कांग्रेस द्वारा महिला प्रत्याशियों को मौका देने में अधिक रुचि नहीं दिखाई।

किसी भी चुनाव में समुचित भागीदारी नही

आधी आबादी की वकालत करने वाले विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव के मौसम में भी महिलाओं के मुद्दों और उनकी समस्याओं पर मौन हैं। भले घोषणा पत्रों और संकल्प पत्रों में आधी आबादी की बात की गई हो लेकिन, सभी दलों ने टिकट देने में भरपूर कंजूसी बरती है। अब जबकि हर रोज नेता कहीं न कहीं चुनावी रैलियां कर रहे हैं,महिलाएं सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर रह गई हैं। मजे की बात तो ये है कि 1952 से लेकर अब तक एक बार भी चुनाव में किसी महिला पर भरोसा नहीं जताया गया है। हालांकि कांग्रेस से पिछले दो चुनावों से बनारसी मेघवाल व इस चुनाव में सरिता चौहान के नाम उछले थे। वहीं भाजपा से विमला डुकवाल का नाम भी चर्चा में रहा। लेकिन दोनों ही दलों ने महिलाओं को टिकट नहीं दिया।

आंकड़ें: हर बार पुरुष उम्मीदवार

आंकड़ों पर नजर डाले तो बीकानेर से 1952 से 1971 तक महाराजा करणीसिंह निर्दलीय के रूप में लगातार पंाच बार जीते। इसी तरह मनफूलराम भादू तीन बार,अर्जुनराम मेघवाल दो बार चुनाव जीतने में कामयाब हुए। तो हरिराम मक्कासर,श्योपत सिह मक्कासर,महेन्द्र सिंह भाटी,बलराम जाखड़,रामेश्वर डूडी ,धर्मेन्द्र एक एक बार चुनाव जीतने में सफल रहे। फिर भी महिलाओ को मौका नहीं मिल पाया।

वोट प्रतिशत में अव्वल: फिर भी भरोसा नहीं

आंकड़े बताते हैं कि 1950 के दशक में मतदाता के तौर पर महिलाओं की भागीदारी 38.8 फ ीसदी थी। 60 के दशक में यह भागीदारी बढ़कर लगभग 60 फीसदी तक पहुंच गई जबकि इस बीच पुरुषों की भागीदारी में सिर्फ चार फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। पिछले कुछ समय के आंकड़ों को देखें तो 2004 में मतदान करने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं से 8.4 प्रतिशत ज़्यादा थी जबकि 2014 आते-आते बढ़त का यह आंकड़ा महज 1.8 प्रतिशत रह गया।
पिछले चुनावों में भी महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले कम नहीं है।