लाखों का निवेश देने वाला बीकानेर का दिव्यांग, चंद रूपयों को तरस रहा, पढ़ें पूरी खबर

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-पांच भाइयों में चार दिव्यांग, फिर भी जी रहे थे बाबू सिंह के भरोसे,
-काम छूटा तो भाइयों का दम भी टूटा, आज अकेला लड़ रहा जीवन से
अनुराग हर्ष. बीकानेर

कभी बीकानेर से श्रीकोलायत के रास्ते में आपने इस इंसान को देखा होगा। नहीं देखा है तो आज देख लीजिए, देखिये भी जरा गौर से। यह वो इंसान है जिसके भरोसे पर कभी लाखों रूपए का संग्रहण होता था। करीब पचास लाख रूपए इसी व्यक्ति के विश्वास पर सहारा इंडिया कंपनी में जमा हुए थे। आज यह इंसान खुद पचास-पचास रूपए के लिए मोहताज है। सहारा इंडिया ने निवेशकों का भरोसा क्या तोड़ा इस विकलांग की वैशाखी ही टूट गई। खुद दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो गया और पूरी ईमानदारी से किए काम का इनाम यह है कि निवेशक आए दिन इस गरीब के कपडे फाडऩे को दौडते हैं।

दर्द की लंबी दास्तां है बाबू सिंह
इस शख्स का नाम है बाबू सिंह तंवर। बाबू सिंह के संघर्ष की कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि वो एक निवेश एजेंसी में काम करता था और आज बेरोजगार हो गया है। यह तो इसके जीवन के दुखों के पहाड का एक पड़ाव मात्र है। दरअसल, बाबू सिंह दिव्यांग है, वो ही नहीं उसके पांच भाई और एक बहन में से चार भाई और बहन दिव्यांग है। जन्म से ही बाबू सिंह के पैर काम नहीं करते थे। वो बहुत ही छोटे आकार में जन्मा इंसान है जो आज 54 साल की उम्र में भी तीन फीट से ज्यादा लंबा नहीं है। उसके तीन अन्य भाई मोड सिंह तंवर, ईश्वर सिंह तंवर, रूपसिंह तंवर व बहन कमला भी दिव्यांग थी। बहन कमला का बेटा भी दिव्यांग है और वो भी बाबू सिंह के साथ ही रहता है। उसका लालन पालन भी बाबू सिंह के कंधों पर ही है। तीन भाई और एक बहन तो दुनिया को विदा कर गए लेकिन बाबू सिंह अपने भांजे के साथ आज भी जिंदगी से लड़ रहा हैं।
यह है बाबू सिंह की कहानी
श्रीकोलायत के गुडा गांव में रहने वाले बाबू सिंह ने साल 1994 में सहारा इंडिया में बतौर एजेंट काम शुरू किया था। वो थोडा बहुत पढ़ लिख लेता था, उम्र 32 साल के आसपास थी तो श्रीकोलायत के लोगों ने भी उसे काफी सहयोग किया। सहारा इंडिया कंपनी तब अच्छा काम कर रही थी, बाबू सिंह को सहयोग करते हुए अपनी मेहनत की राशि आम आदमी भी निवेश कर देता था। हर महीने बाबू सिंह उनके घर पहुंचते, हिस्से की राशि लेते और बीकानेर आकर रूपए जमा करवा देते थे। बाबू सिंह को कमीशन के रूप में और मेहनताने के रूप में इतने रूपए मिल जाते थे कि वो अपना घर आसानी से चला पा रहे थे, अपने भाईयों की भी देखभाल कर लेते थे, जो उसी की तरह दिव्यांग थे। जैसे जैसे सहारा इंडिया ने आम आदमी का भरोसा खोया, लोगों को उनका जमा किया धन मिलना बंद हुआ, वैसे-वैसे बाबू सिंह की हालत बिगड़ती गई। तमाम शारीरिक विषमताओं के बाद भी जिस इंसान ने जीना सीखा था, दुनिया के सामने हाथ फैलाने के बजाय लडऩा सीखा था, उसकी हालत खराब होती चली गई। अब न तो लोग रूपए जमा करा रहे थे और न ही कंपनी से किसी तरह का कमीशन बाबू सिंह को मिल रहा था। आए दिन लोग उससे जमा राशि वापस मांगते। वो कंपनी में जमा एक-एक रूप्ए का हिसाब देने के अलावा कुछ नहीं कर पाता था। बाबू सिंह का कहना है कि अब तो लोग हर रोज ही उससे झगडा करते हैं, पैसे मांगते हैं। बाबू सिंह यह भी स्वीकार करते हैं कि लोगों का गुस्सा गलत नहीं है। उनकी एडी चोटी से की गई कमाई डूब गई। उन्हें उनके हक का पैसा वापस मिलना चाहिए, वो भी ब्याज सहित।

सरकारी सहयोग महज 700 रूपए
आज बाबू सिंह बहुत ही विकट स्थिति में है। दो वक्त की रोटी के लिए उसे किसी के आगे हाथ फैलाना पडता है। सरकारी सहयोग के रूप में उसे सात सौ रूपए की पेंशन मिलती है। जिसमें भोजन का जुगाड़ भी नहीं हो पाता है। अब 54 साल की उम्र में वो शारीरिक रूप से भी इतना कमजोर हो चुका है कि कहीं भी आने जाने की स्थिति में नहीं है। मजदूरी तो संभव ही नहीं है। वो पूरी तरह लोगों की कृपा का पात्र है।

टांग टूटी तो प्लास्टर का पैसा नहीं था
पिछले दिनों जब बाबू सिंह गिरने से घायल हुए तो फिर धन के अभाव ने उसके सामने जीने का संकट खडा दिया। भामाशाह कार्ड के दम पर उसे एक निजी अस्पताल में इलाज तो निशुल्क मिल गया लेकिन फेक्चर हुए पैर पर प्लास्टर लगाने के लिए 450 रूपए का जुगाड करना मुश्किल हो गया। जैसे तैसे मित्रों ने परिचितों ने यह काम करवाया लेकिन अब बाबू सिंह को चिंता है कि गुडा से वापस जाने के लिए किराया और अस्पताल से बाहर की दवाओं का खर्च कहां से आएगा।

सहयोग की जरूरत
दरअसल, बाबू सिंह को हर महीने कम से कम चार-पांच हजार रूपए की जरूरत पडती है। वो जैसे-तैसे हजार डेढ हजार रूपए की व्यवस्था कर पाता है। ऐसे में उसका जीवन दूभर हो गया है। मैं अपने जीने के लिए जुगाड़ नहीं कर पा रहा। बाबू सिंह के साथ ही काम कर चुके डूंगरसिंह तेहनदेसर सहारा इंडिया कंपनी की नीतियों से नाराज है। उनका कहना है कि कंपनी के अधिकारियों को हाल ही में फोन करके बताया था कि बाबू सिंह घायल है, उसे कुछ धन की व्यवस्था कर दो। कंपनी अधिकारियों ने धन तो दूर उसे दो शब्द कहने की हिम्मत तक नहीं जुटाई।

अगर आप कर सकें सहयोग
अगर कोई पाठक बाबू सिंह का सहयोग करना चाहता है तो उनके मित्र डूंगरसिंह तेहनदेसर से संपर्क कर सकते हैं। डूंगरसिंह के नंबर 9351339088 है।

इनका कहना है
हां, बाबू सिंह हमारे यहां कमीशन बेस्ड एजेंट थे। उनकी दुर्घटना की जानकारी मिली थी। मैं बाहर था, कल ही उनसे मिलकर आउंगा। उनका हर संभव सहयोग करेंगे। उनके निवेशकों को भी जल्दी ही बकाया धन मिल जाएगा।
-अब्दुल कामरान, रीजनल मैनेजर, सहारा इंडिया बीकानेर